उत्तराखंड में 'नारी शक्ति' और 'परिसीमन' पर महासंग्राम: बदल जाएगा विधानसभा की सीटों का भूगोल, पहाड़ की सत्ता पर मैदान का 'दांव'

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देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में इस समय 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' और आगामी 'परिसीमन' ने भूचाल ला दिया है। प्रदेश की 70 विधानसभा सीटों का वर्तमान गणित अब इतिहास बनने की ओर है। महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण और जनसंख्या के आधार पर होने वाले नए परिसीमन ने सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जुबानी जंग तेज कर दी है। जहां भाजपा इसे महिला सशक्तीकरण का मास्टरस्ट्रोक बता रही है, वहीं कांग्रेस इसे चुनावी लाभ लेने का राजनीतिक हथकंडा करार दे रही है।

उत्तराखंड में सबसे बड़ी चर्चा परिसीमन को लेकर है। वर्तमान में विधानसभा की 70 सीटों में से अधिकांश सीटों पर पर्वतीय जिलों का दबदबा है। लेकिन, परिसीमन का आधार 'जनसंख्या' होने के कारण समीकरण पूरी तरह उलझ सकता है। पलायन और विरल जनसंख्या के कारण पर्वतीय क्षेत्रों की सीटें घटने की आशंका है, जबकि हरिद्वार, देहरादून, ऊधमसिंह नगर और नैनीताल जैसे मैदानी जिलों में जनसंख्या विस्फोट के कारण सीटों की संख्या में भारी उछाल आना तय है। जानकारों का मानना है कि परिसीमन के बाद सीटों की कुल संख्या 100 के पार जा सकती है, जिसमें मैदानी क्षेत्रों की हिस्सेदारी 33 से बढ़कर 45-50 तक पहुंच सकती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया देहरादून दौरे के बाद भाजपा ने आक्रमण रुख अख्तियार कर लिया है। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष महेंद्र भट्ट का कहना है कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम महिला सशक्तीकरण की दिशा में ऐतिहासिक कदम है। उन्होंने कांग्रेस पर कटाक्ष करते हुए कहा कि जब पूर्व में कांग्रेस ने ही इसका समर्थन किया था, तो अब वह भ्रम क्यों फैला रही है? भाजपा का तर्क है कि परिसीमन एक संवैधानिक प्रक्रिया है और इसे राजनीति से जोड़ना गलत है।

दूसरी ओर, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने भाजपा की मंशा पर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस का आरोप है कि संसद का विशेष सत्र केवल आगामी चुनावों में लाभ लेने के लिए बुलाया गया है। गोदियाल ने मांग की है कि 33 प्रतिशत महिला आरक्षण अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से ही लागू हो, लेकिन यह वर्तमान की 70 सीटों पर ही होना चाहिए। कांग्रेस का कहना है कि परिसीमन का आधार केवल जनसंख्या नहीं होना चाहिए, क्योंकि इससे विषम भौगोलिक परिस्थितियों वाले पहाड़ को भारी नुकसान होगा और सत्ता का केंद्र पूरी तरह मैदान की ओर खिसक जाएगा। हालांकि, तकनीकी रूप से अगले वर्ष होने जा रहे विधानसभा चुनाव में नया परिसीमन और महिला आरक्षण लागू होने के आसार कम हैं, लेकिन इस मुद्दे ने राजनीतिक माहौल गर्मा दिया है। विपक्षी खेमे में इस बात को लेकर गहरी बेचैनी है कि अगर परिसीमन हुआ तो पहाड़ की राजनीतिक आवाज कमजोर हो सकती है। यदि यह गतिरोध जारी रहा, तो आगामी चुनावों में 'पहाड़ का हक' एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनकर उभर सकता है।  उत्तराखंड की राजनीति में अब शक्ति का संतुलन बदलने वाला है। परिसीमन केवल सीटों का फेरबदल नहीं, बल्कि राज्य के भविष्य की दिशा तय करने वाला मुद्दा बन गया है, जिस पर आने वाले दिनों में और भी तीखा घमासान देखने को मिल सकता है।